मणिपुर की राजधानी इम्फाल में पारंपरिक हथकरघा बुनकरों के लिए एक महत्वपूर्ण पहल की गई है। जिला उद्योग केंद्र (डीआईसी) ने राज्य की समृद्ध मणिपुरी वस्त्र कला को बढ़ावा देने और स्थानीय बुनकरों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के उद्देश्य से विशेष वित्तीय सहायता कार्यक्रम शुरू किया है। इस कार्यक्रम के तहत बुनकरों को आसान ऋण उपलब्ध कराने के साथ-साथ उन्हें डिजिटल पोर्टल से जोड़ने की प्रक्रिया भी शुरू की गई है, जिससे वे ऑनलाइन बाजारों तक पहुंच सकें और अपने उत्पादों की बिक्री बढ़ा सकें।
डीआईसी के अधिकारियों के अनुसार, इस योजना का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक बुनकरों को आधुनिक तकनीक और वित्तीय संसाधनों से जोड़ना है। बुनकरों को कम ब्याज दर पर ऋण प्रदान किया जाएगा, जिससे वे उच्च गुणवत्ता वाले कच्चे माल, उन्नत करघे और डिजाइन में निवेश कर सकें। इसके अलावा, डिजिटल पोर्टल के माध्यम से बुनकरों को ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म, सरकारी योजनाओं की जानकारी और बाजार की मांग के बारे में अपडेट मिलेगा, जिससे उनकी आय में वृद्धि होगी।
मणिपुरी वस्त्र कला, विशेष रूप से फीरोक और अन्य पारंपरिक बुनाई शैलियाँ, राज्य की सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न हिस्सा हैं। हाल के वर्षों में बढ़ती प्रतिस्पर्धा और बाजार की पहुंच की कमी के कारण बुनकरों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। यह वित्तीय सहायता कार्यक्रम उन्हें न केवल आर्थिक संबल प्रदान करेगा, बल्कि उनकी कला को संरक्षित और पुनर्जीवित करने में भी मदद करेगा। स्थानीय बुनकरों ने इस पहल का स्वागत करते हुए इसे एक सकारात्मक कदम बताया है।
इस योजना के तहत पंजीकरण प्रक्रिया को सरल बनाया गया है। इच्छुक बुनकर जिला उद्योग केंद्र के कार्यालय में आवेदन कर सकते हैं या डिजिटल पोर्टल के माध्यम से ऑनलाइन पंजीकरण करा सकते हैं। अधिकारियों ने बताया कि पात्रता मानदंडों में पारंपरिक बुनाई में अनुभव, स्थानीय निवास और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग से संबंधित होना शामिल है। चयनित बुनकरों को ऋण के साथ-साथ प्रशिक्षण और विपणन सहायता भी प्रदान की जाएगी, जिससे वे आत्मनिर्भर बन सकें।
राज्य सरकार ने इस पहल को 'आत्मनिर्भर मणिपुर' की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया है। डीआईसी ने स्थानीय समुदायों, गैर-सरकारी संगठनों और बुनकर सहकारी समितियों के साथ मिलकर जागरूकता अभियान चलाने की योजना बनाई है, ताकि अधिक से अधिक बुनकर इस योजना का लाभ उठा सकें। इससे न केवल पारंपरिक हथकरघा उद्योग को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि स्थानीय रोजगार के अवसर भी सृजित होंगे और मणिपुर की सांस्कृतिक पहचान वैश्विक स्तर पर मजबूत होगी।