इम्फाल घाटी में धान की कटनी के मौसम के दौरान, कृषि विभाग ने किसानों को पराली न जलाने और वैकल्पिक प्रबंधन के तरीकों के बारे में जागरूक करने के लिए कई जागरूकता शिविर आयोजित किए हैं। यह कदम बढ़ते वायु प्रदूषण और मिट्टी की उर्वरता में कमी को देखते हुए उठाया गया है। विभाग के अधिकारियों ने बताया कि पराली जलाने से न केवल पर्यावरण को नुकसान होता है, बल्कि किसानों की आय पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
शिविरों में कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को पराली को खाद में बदलने, मशरूम की खेती में उपयोग करने और पशु चारे के रूप में इस्तेमाल करने जैसे वैकल्पिक तरीकों के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि पराली जलाने से मिट्टी में मौजूद लाभकारी सूक्ष्मजीव नष्ट हो जाते हैं, जिससे फसल उत्पादकता घटती है। इसके अलावा, धुएं से सांस की बीमारियां बढ़ती हैं, खासकर बच्चों और बुजुर्गों में।
स्थानीय किसानों ने शिविरों में सक्रिय भागीदारी दिखाई और अपनी आशंकाओं को साझा किया। कई किसानों ने कहा कि पराली जलाना आसान और सस्ता तरीका लगता है, लेकिन अब वे वैकल्पिक उपायों को अपनाने के लिए तैयार हैं, बशर्ते उन्हें उचित सहायता और प्रशिक्षण मिले। कृषि विभाग ने आश्वासन दिया कि पराली प्रबंधन के लिए आवश्यक उपकरण और वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जाएगी।
विभाग ने इस पहल को 'पराली प्रबंधन अभियान' के तहत शुरू किया है, जिसमें गांवों में नुक्कड़ नाटक, पोस्टर और सोशल मीडिया के माध्यम से भी जागरूकता फैलाई जा रही है। अधिकारियों ने बताया कि आने वाले दिनों में और अधिक शिविर आयोजित किए जाएंगे, ताकि अधिक से अधिक किसानों तक पहुंचा जा सके। इसके अलावा, पराली जलाने पर निगरानी रखने के लिए स्थानीय प्रशासन के साथ समन्वय किया जा रहा है।
पर्यावरणविदों ने इस पहल का स्वागत किया है और कहा है कि इससे इम्फाल घाटी में वायु गुणवत्ता में सुधार होगा। उन्होंने सुझाव दिया कि सरकार को पराली प्रबंधन के लिए दीर्घकालिक नीति बनानी चाहिए और किसानों को प्रोत्साहन देना चाहिए। कृषि विभाग का मानना है कि जागरूकता और सही तकनीक के इस्तेमाल से पराली जलाने की प्रथा को रोका जा सकता है और टिकाऊ खेती को बढ़ावा दिया जा सकता है।